
सार्वजनिक जीवन में जनता के बीच उनकी लोकप्रियता और स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भूमिका ने क्षेत्र से विधायक निर्वाचित हुए ।।
लोकायुक्त न्यूज़
पटना। भारत की स्वतंत्रता का इतिहास त्याग, संघर्ष और बलिदान की अनगिनत गाथाओं से भरा है। इस इतिहास में अनेक ऐसे स्वतंत्रता सेनानी भी रहे, जिनका योगदान व्यापक स्तर पर दर्ज नहीं हो सका। बभनबारा, सिवान निवासी स्वर्गीय कमरुल हक ऐसे ही सेनानी थे, जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने के साथ जीवनभर हिंदू-मुस्लिम एकता, सामाजिक सौहार्द और कौमी एकता का संदेश दिया।
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से हासिल की शिक्षा
कमरुल हक का जन्म वर्ष 1902 में बभनबारा, सिवान में हुआ था। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU), अलीगढ़ से शिक्षा प्राप्त की। युवावस्था में ही वह देश के स्वतंत्रता आंदोलन और महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित हो गए थे। शिक्षा के साथ उनका झुकाव राष्ट्र की स्वतंत्रता और सामाजिक एकता की ओर बढ़ता गया।
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उन्होंने लोगों के बीच जाकर अंग्रेजी शासन के खिलाफ जनजागरण के साथ हिंदू-मुस्लिम एकता को मजबूत करने का प्रयास किया। उनका मानना था कि भारत को स्वतंत्र कराने के लिए समाज के सभी वर्गों का एकजुट होना आवश्यक है।
महात्मा गांधी और राजेंद्र प्रसाद के साथ जुड़ा आंदोलन
कमरुल हक का स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ाव उस दौर में हुआ, जब महात्मा गांधी, डॉ. राजेंद्र प्रसाद और मौलाना मजहरुल हक जैसे राष्ट्रीय नेता बिहार सहित पूरे देश में स्वतंत्रता और सामाजिक एकता का संदेश दे रहे थे।
बताया जाता है कि लगभग 22-25 वर्ष की आयु में उन्हें सीवान में महात्मा गांधी के आगमन के दौरान उनके दर्शन और विचार सुनने का अवसर मिला। 16 जनवरी 1927 को महात्मा गांधी महाराजगंज के रास्ते डॉ. राजेंद्र प्रसाद के पैतृक आवास जीरादेई पहुंचे थे। इस अवसर पर आयोजित कौमी एकता सम्मेलन में कमरुल हक ने भी सक्रिय भागीदारी की।
उस सम्मेलन में मौलाना मजहरुल हक, राजा रफीक बाबू, सगीरुल हक उर्फ मुख्तार बाबू, अब्दुल खालिद उर्फ हकीम जी, श्रीकृष्ण सिंह और मोहम्मद हबीबुल्लाह सहित कई प्रमुख लोग उपस्थित थे। कमरुल हक ने इन नेताओं के साथ मिलकर राष्ट्रीय एकता और हिंदू-मुस्लिम भाईचारे का संदेश जन-जन तक पहुंचाने में भूमिका निभाई।
गांधी के विचारों से प्रभावित होकर अपनाई खादी
महात्मा गांधी के सादगीपूर्ण जीवन और स्वदेशी विचारों से कमरुल हक गहराई से प्रभावित हुए। गांधीजी के आह्वान पर उन्होंने खादी का पायजामा-कुर्ता और टोपी पहनना शुरू किया। बताया जाता है कि लंबे समय तक खादी ही उनकी पहचान बनी रही।
उनका जीवन सादगी, देशभक्ति और सामाजिक सौहार्द का उदाहरण रहा। वह स्वतंत्रता के साथ-साथ समाज में आपसी भाईचारे और एकता को भी उतना ही महत्वपूर्ण मानते थे।
1957 में बने बड़हरिया के विधायक
देश आजाद होने के बाद भी कमरुल हक का सार्वजनिक जीवन जारी रहा। जनता के बीच उनकी लोकप्रियता और स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भूमिका के चलते 1957 में वह बड़हरिया विधानसभा क्षेत्र से विधायक निर्वाचित हुए। उन्होंने वर्ष 1957 से 1962 तक विधायक के रूप में क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया।
उनके पुत्र मो. उमैर के अनुसार, कमरुल हक दिल्ली जाकर देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से भी मिले थे। विधायक रहते हुए भी वह जनता और सामाजिक सरोकारों से जुड़े रहे।
30 जून 1993 को हुआ निधन
लंबे सामाजिक और सार्वजनिक जीवन के बाद 30 जून 1993 को कमरुल हक का निधन हो गया। उन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा देश की आजादी, सामाजिक सौहार्द और हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए समर्पित किया।
आज जब देश स्वतंत्रता आंदोलन के वीरों और उनके योगदान को याद करता है, तब कमरुल हक जैसे सेनानियों का स्मरण भी जरूरी हो जाता है। उनका जीवन यह संदेश देता है कि राष्ट्र की मजबूती केवल स्वतंत्रता प्राप्त करने में नहीं, बल्कि एकता, भाईचारे और सामाजिक सद्भाव को निरंतर मजबूत करने में भी है।
कमरुल हक : एक नजर में
नाम: स्वर्गीय कमरुल हक
जन्म: 1902
जन्मस्थान: बभनबारा, सिवान
शिक्षा: अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़
भूमिका: स्वतंत्रता आंदोलन एवं कौमी एकता
प्रमुख राष्ट्रीय नेताओं से जुड़ाव: महात्मा गांधी, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, मौलाना मजहरुल हक
विधानसभा क्षेत्र: बड़हरिया
विधायक कार्यकाल: 1957–1962
निधन: 30 जून 1993
पहचान: स्वतंत्रता सेनानी, जनप्रतिनिधि एवं हिंदू-मुस्लिम एकता के समर्थक
