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योग शरीर, मन एवं आत्मा को जोड़ने की भारतीय प्रणाली : डॉ. बालमुकुंद पाण्डेय


लोकायुक्त संवाद

नई दिल्ली। केशवकुंज, झंडेवालान स्थित अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के केन्द्रीय कार्यालय में शनिवार को एक विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया। “नामूलं लिख्यते किञ्चित” व्याख्यानमाला के अंतर्गत आयोजित इस कार्यक्रम का मुख्य विषय “भारत की विविध योग परंपरा का इतिहास” था। यह आयोजन भारतीय इतिहास संकलन योजना समिति (दिल्ली प्रान्त) एवं माधव संस्कृति न्यास के संयुक्त तत्वावधान में संपन्न हुआ।
​योग मानवता के कल्याण की समग्र प्रणाली: डॉ. बालमुकुंद पाण्डेय
​व्याख्यानमाला के संरक्षक, मुख्य अतिथि एवं अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना समिति के राष्ट्रीय संगठन सचिव डॉ. बालमुकुंद पाण्डेय ने अपने पाथेय में कहा कि योग भारतीय ज्ञान परंपरा का प्रकाश स्तंभ है।
​”योग भारतीय आध्यात्मिक चेतना की निरंतरता, समन्वय और समग्र स्वास्थ्य का ‘योजक’ है। यह सनातन वैदिक धरोहर का एक दिव्य आयाम है। 5,000 वर्ष पूर्व भारत में उत्पन्न योग शरीर, मन और आत्मा को जोड़ने का तंत्र है, जो वैश्विक स्तर पर रोगों के नियंत्रण और स्वास्थ्य रखरखाव के लिए सर्वाधिक विश्वसनीय प्रणाली बन चुका है।”
— डॉ. बालमुकुंद पाण्डेय
​सिंधु-सरस्वती सभ्यता से जुड़ा है योग का इतिहास: प्रो. रजनीश शुक्ल
​कार्यक्रम के मुख्य वक्ता, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय (वर्धा) के पूर्व कुलपति एवं अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष आचार्य (डॉ.) रजनीश कुमार शुक्ल ने विषय प्रवर्तन करते हुए कहा कि भारत की योग परंपरा का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। इसकी जड़ें 2700 ईसा पूर्व की सिंधु-सरस्वती सभ्यता तक जाती हैं। वेदों, उपनिषदों, महाभारत, भगवद्गीता, पतंजलि योगसूत्र और हठयोग से विकसित होते हुए आज यह वैश्विक योग दिवस के रूप में भारतीय संस्कृति का विश्वव्यापी प्रतीक बन चुका है। उन्होंने जोर देकर कहा कि योग की आंतरिक शुद्धता और शुचिता केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि समष्टिगत (सामाजिक) होती है।
​योग केवल व्यायाम नहीं, जुड़ाव और एकत्व का माध्यम: प्रो. बी.आर. मणि
​कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विख्यात पुरातत्वविद, पद्मश्री प्रो. बुद्ध रश्मि मणि ने कहा कि योग का वास्तविक उद्देश्य व्यक्ति की आत्मा को ईश्वरीय सत्ता से जोड़ना है। आसन और प्राणायाम के माध्यम से शरीर और मन में संतुलन स्थापित होता है। योग केवल शारीरिक व्यायाम या आसन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका गहरा अर्थ जुड़ाव और एकत्व है। यह हमें स्वयं से, समाज से और परम सत्य से जोड़कर सामाजिक व सांस्कृतिक एकता स्थापित करता है।
​प्रबुद्धजनों एवं शोधार्थियों की गरिमामयी उपस्थिति
​कार्यक्रम का कुशल संचालन भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के उप निदेशक एवं राष्ट्रीय प्रचार प्रमुख डॉ. सौरभ कुमार मिश्र ने किया। धन्यवाद ज्ञापन दिल्ली प्रान्त के कार्यकारिणी सदस्य डॉ. संजीव कुमार मिश्र द्वारा प्रस्तुत किया गया।
​इस अवसर पर इतिहास जगत की कई प्रतिष्ठित विभूतियाँ उपस्थित रहीं, जिनमें:
​प्रो. सुस्मिता पाण्डे (प्रमुख, बृहद इतिहास परियोजना एवं सदस्य, ICHR)
​प्रो. धर्मचंद चौबे (अध्यक्ष, दिल्ली प्रान्त)
​डॉ. नरेंद्र शुक्ल (प्रमुख, शोध एवं प्रकाशन विभाग)
​प्रो. अखिलेश कुमार दुबे व प्रो. युथिका मिश्र (उपाध्यक्ष, दिल्ली प्रान्त)
​डॉ. अजय सिंह (संगठन मंत्री, दिल्ली प्रान्त)
​सहित सुरेंद्र हंस, शत्रुजीत सिंह, डॉ. अस्मित शर्मा, सचिन झा और मुकेश उपाध्याय प्रमुख थे। व्याख्यानमाला में विभिन्न विश्वविद्यालयों के प्राध्यापकों, डेढ़ सौ से अधिक शिक्षक-शोधार्थियों और छात्र-छात्राओं ने सहभागिता की। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रहितैषी चर्चा और सुरुचिपूर्ण जलपान के साथ हुआ।

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