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बुद्धा पार्क में करोड़ों का खेल! 25 लाख की पेनाल्टी दबी,अधूरा पड़ा काम, फिर भी जिम्मेदार मौन

बुद्धा पार्क बना लापरवाही का स्मारक! 25 लाख की पेनाल्टी डकार गया ठेकेदार, अवर अभियंता की निगरानी पर भी सवाल

साजिद अंसारी/लोकायुक्त न्यूज


कुशीनगर। जब किसी परियोजना की समयसीमा खत्म हो जाए, ठेकेदार की लापरवाही सरकारी रिपोर्ट में दर्ज हो, लाखों रुपये की पेनाल्टी बन जाए, फिर भी न पेनाल्टी वसूली की जाए और न परियोजना पूरी हो तो सवाल सिर्फ लापरवाही व भ्रष्टाचार का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की नीयत पर सवाल खड़ा होता है। कुशीनगर के बुद्धा पार्क परियोजना में सामने आए दस्तावेज यही संकेत दे रहे हैं। सरकारी रिपोर्टों में दर्ज तथ्यों ने अब इस आशंका को जन्म दे दिया है कि कहीं परियोजना में देरी, ढिलाई और कार्रवाई का अभाव किसी बड़े भ्रष्टाचार की परतों को तो नहीं ढंक रहा। बतादे कि ठेकेदार की लापरवाही पर विभाग की मुहर लग चुकी है।
आईजीआरएस जांच में जिला उद्यान अधिकारी और प्रान्तीय खंड कसया के अवर अभियंता के संयुक्त हस्ताक्षर से प्रस्तुत रिपोर्ट में स्पष्ट उल्लेख है कि बुद्धा पार्क परियोजना 15 सितंबर 2025 तक पूर्ण होकर हस्तांतरित हो जानी चाहिए थी। लेकिन समयसीमा गुजरने के महीनों बाद भी पार्क अधूरा पड़ा रहा। रिपोर्ट के अनुसार कार्यदायी संस्था पर एमओयू की शर्तों के तहत 24.98 लाख रुपये की पेनाल्टी बन चुकी थी। इससे भी गंभीर तथ्य यह है कि यूपीआरएनएसएस के अधिशासी अभियंता ने अपने पत्र में स्वीकार किया कि ठेकेदार कार्य में रुचि नहीं ले रहा था और बार-बार निर्देशों के बावजूद काम की गति बेहद धीमी थी। यदि सरकारी दस्तावेज स्वयं यह बता रहे हैं कि ठेकेदार समय पर काम नहीं कर रहा था,परियोजना निर्धारित अवधि से महीनों पीछे चल रही थी, फरवरी माह तक लगभग 25 लाख रुपये की पेनाल्टी बन चुकी थी, (मार्च से जून तक तक हुए बिलंब का पेनाल्टी अलग है।) तो फिर आज तक पेनाल्टी की वसूली क्यों नहीं हुई?यही वह सवाल है जो पूरे मामले को सामान्य प्रशासनिक लापरवाही से आगे ले जाकर भ्रष्टाचार और संरक्षणवाद की आशंका पैदा करता है। क्योंकि नियम कहते हैं कि समयसीमा तोड़ने वाले ठेकेदार पर आर्थिक दंड लगाया जाए। लेकिन बुद्धा पार्क में ऐसा प्रतीत होता है कि दंड का प्रावधान कागजों में रहा और ठेकेदार को व्यवहारिक तौर पर राहत मिलती रही।

क्यो साइट अवर अभियन्ता देते रहे तारीख-पे-तारीख

आईजीआरएस शिकायत पर जिला उद्यान अधिकारी द्वारा प्रस्तुत आख्या ने पूरे मामले को नया मोड़ दे दिया है। रिपोर्ट के अनुसार निरीक्षण के दौरान साइट पर न तो आवश्यक अभिलेख उपलब्ध था और न ही निर्माण कार्य के जिम्मेदार इंजीनियर मौजूद थे। फोन पर संपर्क करने पर इंजीनियर ने पहले बाद में आने का भरोसा दिया, फिर दूसरी तारीख बताई और फिर एक और नई तारीख देकर अपने दायित्वों का इतिश्री कर लिया, मतलब यह कि साइट इंजिनियर तारीख पे तारीख देकर जांच अधिकारी को घुमाते रहे। नतीजतन जांच अधिकारी ने बिना डीपीआर के निर्माण स्थल का निरीक्षण कर वास्तविकता से रुबरु कराते हुए समय सीमा के अन्दर अपनी आख्या पोर्टल पर अपलोड कर दिया। अब सवाल यह है कि यदि निर्माण कार्य पूरी तरह नियमों और मानकों के अनुरूप हो रहा है, तो निरीक्षण से बचने की जरूरत आखिर क्यों पड़ी? क्यो साइट अवर अभियन्ता जांच अधिकारियों को डीपीआर सहित अन्य दस्तावेज उपलब्ध कराने के लिए तारीख पे तारीख देकर टालते रहे। कहना ना होगा कि किसी भी सरकारी निर्माण परियोजना की डीपीआर उसका तकनीकी संविधान होती है। इसी दस्तावेज में यह दर्ज होता है कि कितनी लागत से क्या निर्माण होना है, नींव की गहराई कितनी होगी, किस गुणवत्ता की सामग्री का उपयोग किया जाएगा और कार्य का स्वरूप क्या होगा। लेकिन बुद्धा पार्क मामले में जांच अधिकारी को यही दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराया गया।इससे यह आशंका और मजबूत हो जाती है कि कहीं डीपीआर और मौके पर हो रहे निर्माण के बीच ऐसा अंतर तो नहीं, जिसे सार्वजनिक होने से बचाया जा रहा है।

निगरानी पर सवाल

जानकारो की माने तो निर्माण स्थल पर तैनात अवर अभियंता की जिम्मेदारी केवल माप पुस्तिका तैयार करना नहीं, बल्कि कार्य की गुणवत्ता और प्रगति की निगरानी करना, साइट पर सभी दस्तावेज उपलब्ध रखना, जांच के दौरान सभी दस्तावेजो के साथ मौजूद रहना भी होता है। इसके अलावा जब ठेकेदार महीनों तक काम में रुचि नहीं ले रहा था, तब साइट पर निगरानी कर रहे अवर अभियंता ने क्या कदम उठाए? क्या उच्चाधिकारियों को लगातार अवगत कराया गया?क्या ठेकेदार के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की संस्तुति की गई? क्या निर्माण प्रगति की वास्तविक स्थिति रिपोर्टों में दर्ज की गई?यदि यह सब हुआ, तो परिणाम क्यों नहीं दिखा?
और यदि नहीं हुआ, तो यह सवाल उठना मुनासिब है कि क्या निगरानी तंत्र जानबूझकर धृतराष्ट्र बना रहा?

धन का बंदरबांट अधूरा पार्क, सुरक्षित ठेकेदार

बुद्धा पार्क आज तक पूरी तरह तैयार होकर उद्यान विभाग को हस्तांतरित नहीं किया गया है। यानी जनता को न पार्क मिला, न समय पर परियोजना का लाभ। दूसरी ओर निर्माण कार्य मे धन का बंदरबांट की निष्पक्ष अधूरी जांच व सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज पेनाल्टी भी वसूली नहीं गई। यही वह स्थिति है जहां भ्रष्टाचार की आशंका सबसे अधिक मजबूत होती है। क्योंकि सामान्य प्रशासनिक व्यवस्था में न तो पेनाल्टी इतनी आसानी से छोड़ी जाती है और न ही महीनों तक अधूरी परियोजना पर आंखें मूंदी जाती हैं। सबसे गंभीर पहलू यह है कि यह पूरा मामला किसी दूरस्थ इलाके का नहीं, बल्कि जिला मुख्यालय के सबसे संवेदनशील क्षेत्र का है जहां डीएम कार्यालय, सीडीओ कार्यालय और अन्य महत्वपूर्ण सरकारी दफ्तरों की निगाहे टिकी हुई है। बावजूद इसके जांच अधिकारी को डीपीआर तक न मिले, जिम्मेदार इंजीनियर निरीक्षण से अनुपस्थित रहे और ठेकेदार की लापरवाही के कारण निर्माण कार्य में हुए बिलंब के बाद लगाये पेनाल्टी की वसूली न किया जाए तो यह सामान्य प्रशासनिक चूक नहीं मानी जा सकती।

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