
दूध, धान का लावा और पुष्प अर्पित कर नाग देवता की पूजा की परंपरा, कालसर्प दोष की शांति के लिए भी किया जाता है मंत्र जाप
बैलिस्टर तिवारी | लोकायुक्त न्यूज
कुशीनगर। श्रावण शुक्ल पंचमी को नाग पंचमी के रूप में मनाया जाता है। इस वर्ष 17 अगस्त, सोमवार को श्रावण शुक्ल पंचमी तिथि शाम 6:49 बजे तक रहेगी। हस्त नक्षत्र सुबह 6:46 बजे तक रहेगा, इसके बाद चित्रा नक्षत्र और शुभ योग का संयोग बनेगा। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार इस विशेष संयोग में भगवान शिव और नाग देवता की पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है।ज्योतिषाचार्य पं. साकेत मिश्रा ने बताया कि नाग पंचमी पर श्रद्धा और विधि-विधान से नाग देवता का पूजन करना चाहिए। पूजन में दूध, धान का लावा, सफेद पुष्प और धूप आदि अर्पित करने की परंपरा है। इसके बाद नाग देवता की प्रसन्नता के लिए “ॐ नवकुल नागाय विद्महे विषदन्ताय धीमहि। तन्नो सर्पः प्रचोदयात्।” मंत्र का जाप करने की मान्यता है।उन्होंने बताया कि जिन जातकों की जन्मकुंडली में कालसर्प दोष अथवा सर्प श्राप से संबंधित कष्ट बताए गए हैं, वे नाग पंचमी के दिन भगवान शिव के साथ नाग देवता की पूजा और मंत्र जाप कर सकते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इससे ऐसे दोषों की शांति में सहायता मिलती है।

शेषनाग, वासुकि, तक्षक और कालिया का पौराणिक उल्लेख
पौराणिक मान्यताओं में नागों की उत्पत्ति का भी विस्तृत उल्लेख मिलता है। शेषनाग, वासुकि, तक्षक और कालिया प्रमुख नागों में माने जाते हैं। मान्यता है कि ऋषि कश्यप की पत्नियों कद्रु और विनता से नागों की उत्पत्ति हुई। स्कंद पुराण में भी नाग पंचमी पर नाग देवता की पूजा के विशेष महत्व का वर्णन मिलता है।
घर के मुख्य द्वार पर बनाई जाती है नाग की आकृति
नाग पंचमी के दिन घर के मुख्य द्वार के दोनों ओर गोबर से नाग की आकृति बनाने की परंपरा भी है। इसके बाद गाय के कच्चे दूध, पुष्प आदि से नाग देवता का पूजन किया जाता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार पूजन के बाद इन्द्राणी देवी की भी दूध, धान का लावा, पुष्प और नैवेद्य से पूजा की जाती है।मान्यता है कि इस विधि से श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना करने से परिवार पर नाग देवता और भगवान शिव की कृपा बनी रहती है तथा सुख-शांति और समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है। नाग पंचमी का पर्व सनातन परंपरा में प्रकृति और जीव-जंतुओं के प्रति सम्मान की भावना से भी जुड़ा महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है।
